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अर्थ और मानव

#EDMranjit
अर्थ और मानव  वक्त ने खिलाफत की सारे जुल्मों का हिसाब ले लिया।
एक साख से निकलकर हर साख को निगल लिया।
ताकती रह गई दुनियां हर मंजर बदलता रहा।
इंसा थके पैरो से दिन रात चलता रहा।

नहीं छोड़ा किसी को मुकम्मल हर दर दरबदर हुआ।
क्या पैसा क्या हुनर क्या  ताकत सब लचर हुआ।
खौफ ऐसा मौत की चादर का न कफन नसीब हुआ।
महलों के मतवालों का अंत भी इस कदर हुआ।

भागती दुनियां ताकती राहें गुमनाम अंधेरा डुबता सूरज।
सब आँस की नाँव एक एक कर अंधकारमय हुआ।
घर विरान जंगल सुनसान न कोई मेहमान हर सख्स बना अंजान।
नम आँखों ने कहाँ नहीं देखा पहले कभी ऐसा तूफान।

गाँव अपना शहर अपना याद आया उन्हें जो चल दिए थे।
सब छोड़कर चमकीले विदेशों की चमचमाती दुनियां मैं।
ये वापसी मिलन भी क्या खुब याद आएगा उन्हें गर बच सके तो दास्ताने अपनी बयाँ कर थकेंगे नहीं वो सब।

कर सके तो फिर इतना सा खत याद रखना धरा की मार से।
अब भी नहीं समझ पाए तो बचना हैं मुश्किल मौत की ललकार से।
ये तूफ़ान वो संकट हैं जो कभी छंट नहीं सकता।
जब तक मानव अपनी गलतियों पर रूक नहीं सकता।
अर्थ और मानव  तुमने जल सुखाया जल बहाया मैं चुप रहा तुम्हारे लिए।
तुमनें ज…