Posts

Showing posts from 2020

अर्थ और मानव

#EDMranjit
अर्थ और मानव  वक्त ने खिलाफत की सारे जुल्मों का हिसाब ले लिया।
एक साख से निकलकर हर साख को निगल लिया।
ताकती रह गई दुनियां हर मंजर बदलता रहा।
इंसा थके पैरो से दिन रात चलता रहा।

नहीं छोड़ा किसी को मुकम्मल हर दर दरबदर हुआ।
क्या पैसा क्या हुनर क्या  ताकत सब लचर हुआ।
खौफ ऐसा मौत की चादर का न कफन नसीब हुआ।
महलों के मतवालों का अंत भी इस कदर हुआ।

भागती दुनियां ताकती राहें गुमनाम अंधेरा डुबता सूरज।
सब आँस की नाँव एक एक कर अंधकारमय हुआ।
घर विरान जंगल सुनसान न कोई मेहमान हर सख्स बना अंजान।
नम आँखों ने कहाँ नहीं देखा पहले कभी ऐसा तूफान।

गाँव अपना शहर अपना याद आया उन्हें जो चल दिए थे।
सब छोड़कर चमकीले विदेशों की चमचमाती दुनियां मैं।
ये वापसी मिलन भी क्या खुब याद आएगा उन्हें गर बच सके तो दास्ताने अपनी बयाँ कर थकेंगे नहीं वो सब।

कर सके तो फिर इतना सा खत याद रखना धरा की मार से।
अब भी नहीं समझ पाए तो बचना हैं मुश्किल मौत की ललकार से।
ये तूफ़ान वो संकट हैं जो कभी छंट नहीं सकता।
जब तक मानव अपनी गलतियों पर रूक नहीं सकता।
अर्थ और मानव  तुमने जल सुखाया जल बहाया मैं चुप रहा तुम्हारे लिए।
तुमनें ज…

कोरोना को हराना हैं poem 05/04/2020

Image
#कोरोना को हराना हैं poem 05/04/2020
खौफ मैं है जींदगी फिर भी साथ है मन  हर तरफ माहौल है गमगीन फिर भी एक हे जन जन।  इस तरह टुट कर ना बिखरे ये वतन  आओ मिलकर सब एक हो जाए।  चलो आज शाम एकता का दीपक जलाए
रोशनी एकता की दिखा दे सब मिलकर।  ये देश है स्वालम्बि ये बता दे साथ चलकर। कुछ सहम गए साथी उन्हें भी साथ ले आए।  चलो आज एक होकर एक साथ दीप जलाए।  जीतना है हम सबको देश को साथ लेकर ही हराना हैं महामारी को एक साथ होकर ही।  कोरोना से भी ज्यादा जडे़ मजबुत हैं हमारी।  भारत पड़ेगा इस महामारी पर भी भारी। 
जब भी वतन पर संकट आए जग जाना है।  डट कर सामना करना है औरो को भी जगाना है।  भुल मत जाना साथ रहकर ही हराना हैं।  आज शाम एकता का दिया जलाना हैं।  कोरोना को हराना हैं poem 05/04/2020
आज शाम एकता का दिया जलाना हैं।  Corona ko harana Hai. Poem ranjit choubey www.edmranjit.com 05 /04/2020

बंसत पंचमी कविता 👏30/01/2020

Image
#EDMranjit
बंसत पंचमी कविता👏30/01/2020
इस माँ के बीना तो संसार अधुरा लगता था।
नहीं आती तु तो सब सूना सूना लगता था।
विद्या की देवी माँ तुझ बीन ज्ञान सरोवर सूना था।
तु ज्योति बनकर आई तो बंसत भी पुरा लगता हैं।

 " मधुर स्वर वीणा ज्योति कुंज उज्ज्वल संसार किया।
माँ तुने तो धरा को विद्या कंठ कर दिया।
गुगे का भी स्वर बनी माँ हर मुख मैं तु समाई।
धरती से अंबर तले तु वेदो मैं हैं छाई।

"बीन तेऱे माता जीवन के हर मोड़ पर अंधेरा।
तू हैं तो प्राणी का भी जीवन लगे है पुरा।
माँ वंदना माँ सारदा माँ ज्योतिमय विद्यावाहिनी।
करो कृपा जगत ज्योति रुपा जीव सजल तारिणि।
 बंसत पंचमी कविता👏30/01/2020 "ब्रम्हा का सृजन हो माँ  कंमलडली कहलाई हो।
सरस्वती नदी का रुप माँ धरा पर तुम आई हो।
जगत के कण कण पर माँ तेरा उपकार हैं।

"तु बुद्धि हैं संगीत माँ तु वेद् हो विज्ञान भी।
जीवन की सुरुआत से मानव के उत्थान तक।
जीव जगत से देवो तक माँ तेरा ही तो ज्ञान है।
माँ हंसवाहिनी तुम से ही तीनों लोक प्रकाशमान हैं।

"माँ ऐसे ही जीवन में सभी के प्रकाश फैलाए रखना।
ज्ञान का दिपक जग में जलाए रखना।
हर जीवन की बुद्…