मंजिल तो छुपी नहीं होती किसी की। पौयम💐

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मंजिल तो छुपी नहीं होती किसी की। पौयम💐

मुझें चिखना चिल्लाना नहीं आता। 
मुझे सिटिया बजाना भी नहीं आता। 
वैसे तो एक कवि हु मैं यारों ।।
पर मुझें मुश्कुराना भी नहीं आता।। 

यू तो दुनियां भर में जाता रहता हूं।। 
महफ़िल सजती रहती है हर पहर में। 
बातों का ठहाकों का सिलसिला भी होता हैं।। 
पर बदनसीब हु थोड़ा सा क्योंकि में। 
दिखावों के ठहाकों में भी नहीं रहता।। 

शहर से लेकर हर गाँव मैं आज लोग ।
होशियार पाए जातें हैं।। 
ऐसा सुनते रहता हूं हर महफिलो में अब। 
कुछ आशिक़ बिमार पाए जाते हैं।। 
क्या ये कवियों की महफिल का असर है। 
या फिर अब इश्क में लोग शायर बन जातें है।। 

भटक जाती है कलम भी कभी कभी। 
क्योंकि उस पर जौर मन का हो जाता है।। 
लिखना चाहें भी अगर वो कुछ इशारे को। 
पर मन कुछ और लिखवा़ जाता हैं।। 

किताबों में पढ़ा पर काम का कुछ भी नहीं। 
जिंदगी के रास्ते तो चलने पर मिलते हैं।। 
जो बैठ जाते हैं जिद् पकड़कर राहो में अकेले। 
हम तो बस उस राह पर चलते हैं।। 

मंजील तो छुपी नहीं होती किसी की। 
मगर फिर भी गुमशुदा जरूर होती है 
जब आग लगती है जिंदगी की गलियों में। 
तो प्यास पानी की नहीं समुन्दर की होती है।। 

इस बात से अंजान नहीं है कोई। 
शायद  परेशान अब नहीं है कोई। 
जिसके पास दौलत सबसे ज्यादा होती है। 
कहावत आज भी वही दौर दौहराती हैं। 
जिसकी लाठि उसकी भैंस होती हैं ।।
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Writing by. Ranjit choubeay. 

03/09/2019.   Poetry motivational. 

मंजिल तो छुपी नहीं होती किसी की। पौयम💐











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