हम निभा नहीं पाऐं// poetry💐

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हम निभा नहीं पाऐं// poetry💐

देखो तुम मीलो हमसे।
पर बस अजनबी रहों।
क्योंकि अपनों का साथ।
हम निभा नहीं पाऐं।
।।
जब भी कोशिश की हमनें।
अब सम्भल जाऐ हम।
बस फिर गिर गये ऐसे।
 वापस फिर चल ना पाऐं।
।।
रूकी मंजिल मेरी।
रूका रूका सा कारवाँ रहा।
जब भी कदम से कदम मिलाऐ।
वक्त ने हमें तनहा किया।
।।
वो मिशाल बनें कुछ पल।
जिन पलों मे मेरा साथ रहा।
लेकिन समझें वो बात नहीं।
क्यों हमसे वक्त उदास रहा।
।।
कभी नहीं जान पाऐं हम।
वक्त की चाह क्या रही हमसे।
अगर जानते तो शायद आज।
यहाँ अलफ़ाज़ कुछ और होते।
।।
अभी तलक दबें से रहते हैं।
कोशिश नहीं करते उठने की।
क्योंकि जिंदगी ने चाहा ही नहीं।
हम भी उठकर उसे सलाम करें।

हम निभा नहीं पाऐं// poetry💐

।।लेखन रंजीत चौबे।।
।।दिनांक 12/07/2019 ?
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