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कहीं मिलती हैं निगाहें कही मिलते हैं इंसान//पोयम💐

Edmranjit

कहीं मिलती हैं निगाहें कही मिलते हैं इंसान//पोयम💐

कहीं मिलती हैं निगाहें।
कहीं मिलते हैं इंसान।
कहीं सजती हैं बारातें।
कहीं सजते हैं शमशान।
।।
कहीं दिखता हैं अपनापन।
कहीं दिखता हैं सुनापन।
कही चलती हैं तनहाई।
कहीं दिखती हैं शहनाई।
।।
कहीं आती हैं बरसात।
कहीं चलता हैं तुफान।
कहीं बसता हैं घर आंगन।
कहीं उजड़ा हैं बागान।
।।
कहीं मिलती हैं शाबाशी।
कहीं मिलती हैं शौगात।
कही मीलता जीवन अच्छा।
कहीं तड़पे हैं इंसान।
।।
कहीं सजी हुई हैं धरती।
कहीँ जंगल हैं सुनसान।
कहीं हरियाली हैं दिखती।
कहीं सुखा खेत किसान।
।।
कहीं सजी हुई हैं भाषा।
कहीं बंद पड़ी हैं जुबान।
कहीं दिखे ठाट और बंगला।
कही बदहाली इंसान।
।।
कहीँ बजे राज मे डंका।
कही सून पड़ी हैं गलियां।
कहीं चिंगारी दिखती हैं।
कहीं तड़प रही हैं जान।
।।
कही पुज रहे हैं मंदिर।
कही शौर करे रमजान।
कही झुकें मिले गुरूद्वारे।
कहीं दिखे शांत चर्च सारे।।
।।
कहीँ भटक रहे है नेता।
कही भटक रहा जनमानस।
कही सुन पड़ी हैं सेवा।
कहीं जाग रहा हैं सैनिक।।
।।
कहीं आशा हैं कुछ जागी।
कही दिखें आँख में आश।
कहीं इश्वर सबका मालिक।
कहीं बड़ा बने इंसान।
कहीं बड़ा बने इंसान।।

कहीं मिलती हैं निगाहें कही मिलते हैं इंसान//पोयम💐

Www.edmranjit.com
Writing by ranjit choubeay.

#दिनांक30/06/2019


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