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ऐं आज के मुसाफिर जरा बाहर तो निकल(Poetry )💐

Edmranjit.

 ऐं आज के मुसाफिर जरा बाहर तो निकल(Poetry )💐

ऐं आज के मुशाफिर जरा बाहर तो निकल।
अब शाम ढल रही है।
कुछ थोड़ा तो संम्भल।
ये आशमां भी तेरा।
ये हर दिशा भी तेरी।
तु घुरता ही रहता।
एहसास भी तो कर।
ऐं आज के मुशाफिर जरा बाहर तो निकल।

तु धरा का मोती बनकर ।
एक माला भी बनेगा।
तु समझ के आईने का।
एक चेहरा भी बनेगा।
तु सबर की शाम बनकर उस मुकाम को छुऐगा।
तु डर ना ऐं मुशफिर जरा बाहर तो निकल।
ऐं आज के मुशाफिर''+

जो डरा जमी पे आकर।
वो पहुंचा ना किनारें।
जो खुद ना डग बढाऐं।
उसे मिलतें नहीं सहारें।
तु चल सहस निडर मन
ओ मुकाम के मुशाफिर.
दुनियाँ भी चल रही हैं
तेरे साथ साथ साहिल।
ऐं आज के मुशाफिर""+

तु जानता है मंजिल।
तु बीर हैं निडर हैं।
ये जहान तेरा अपना तु जहाँ का एक शहर हैं।
चल एक राही बन जा।
तु भीड़ से अलग.हैं।
तुझे जानता हैं अम्बर
पहचान उसकी तु हैं।
ऐं आज के मुशाफिर जरा
बाहर तो निकल"""
Www.edmranjit.com
Writing by ranjit choubeay.
##22/06/2019********
 ऐं आज के मुसाफिर जरा बाहर तो निकल(Poetry )💐

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